सती सावित्री

bharati shriji
सती सावित्री

जब यमराज सत्यवान (सावित्री के पति) के प्राणों को अपने पाश में बाँध ले चले, तब सावित्री भी उनके पीछे-पीछे चलने लगी। उसे अपने पीछे आते देखकर यमराज ने उसे वापस लौट जाने के लिए कई बार कहा किंतु सावित्री चलती ही रही एवं अपनी धर्मचर्चा से उसने यमराज को प्रसन्न कर लिया।

सावित्री बोलीः “सत्पुरुषों का संग एक बार भी मिल जाये तो वह अभीष्ट की पूर्ति कराने वाला होता है और यदि उनसे प्रेम हो जाये तो फिर कहना ही क्या? संत-समागम कभी निष्फल नहीं जाता। अतः सदा सत्पुरुषों के साथ ही रहना चाहिए।

देव ! आप सारी प्रजा का नियमन करने वाले हैं, अतः ‘यम’ कहलाते हैं। मैंने सुना है कि मन, वचन और कर्म द्वारा किसी भी प्राणी के प्रति द्रोह न करके सब पर समान रूप से दया करना और दान देना श्रेष्ठ पुरुषों का सनातन धर्म है। यों तो संसार के सभी लोग सामान्यतः कोमलता का बर्ताव करते हैं किंतु जो श्रेष्ठ पुरुष हैं, वे अपने पास आये हुए शत्रु पर भी दया ही करते हैं।”

यमराजः “कल्याणी ! जैसे प्यासे को पानी मिलने से तृप्ति होती है, उसी प्रकार तेरी धर्मानुकूल बातें सुनकर मुझे प्रसन्नता होती है।”

सावित्रि ने आगे कहाः “विवस्वान (सूर्यदेव) के पुत्र होने के नाते आपको ‘वैवस्वत’ कहते हैं। आप शत्रु-मित्र आदि के भेद को भुलाकर सबके प्रति समान रूप से न्याय करते हैं और आप’धर्मराज’ कहलाते हैं। अच्छे मनुष्यों को सत्य पर जैसा विश्वास होता है, वैसा अपने पर भी नहीं होता। अतएव वे सत्य में ही अधिक अनुराग रखते हैं विश्वास की सौहार्द का कारण है तथा सौहार्द ही विश्वास का। सत्पुरुषों का भाव सबसे अधिक होता है, इसलिए उन पर सभी विश्वास करते हैं।”

यमराजः “सावित्री ! तूने जो बातें कही हैं वैसी बातें मैंने और किसी के मुँह से नहीं सुनी हैं। अतः मेरी प्रसन्नता और भी बढ़ गयी है। अच्छा, अब तू बहुत दूर चली आयी है। जा, लौट जा।”

फिर भी सावित्री ने अपनी धार्मिक चर्चा बंद नहीं की। वह कहती गयीः “सत्पुरुषों का मन सदा धर्म में ही लगा रहता है। सत्पुरुषों का समागम कभी व्यर्थ नहीं जाता। संतों से कभी किसी को भय नहीं होता। सत्पुरुष सत्य के बल से सूर्य को भी अपने समीप बुला लेते हैं। वे ही अपने प्रभाव से पृथ्वी को धारण करते हैं। भूत भविष्य का आधार भी वे ही हैं। उनके बीच में रहकर श्रेष्ठ पुरुषों को कभी खेद नहीं होता। दूसरों की भलाई करना सनातन सदाचार है, ऐसा मानकर सत्पुरुष प्रत्युपकार की आशा न रखते हुए सदा परोपकार में ही लगा रहते हैं।”

सावित्री की बातें सुनकर यमराज द्रवीभूत हो गये और बोलेः “पतिव्रते ! तेरी ये धर्मानुकूल बातें गंभीर अर्थ से युक्त एवं मेरे मन को लुभाने वाली हैं। तू ज्यों-ज्यों ऐसी बातें सुनाती जाती है, त्यों-त्यों तेरे प्रति मेरा स्नेह बढ़ता जाता है। अतः तू मुझसे कोई अनुपम वरदान माँग ले।”

सावित्रीः “भगवन् ! अब तो आप सत्यवान के जीवन का ही वरदान दीजिए। इससे आपके ही सत्य और धर्म की रक्षा होगी। पति के बिना तो मैं सुख, स्वर्ग, लक्ष्मी तथा जीवन की भी इच्छा नहीं रखती।”

धर्मराज वचनबद्ध हो चुके थे। उन्होंने सत्यवान को मृत्युपाश से मुक्त कर दिया और उसे चार सौ वर्षों की नवीन आयु प्रदान की। सत्यवान के पिता द्युमत्सेन की नेत्रज्योति लौट आयी एवं उन्हें अपना खोया हुआ राज्य भी वापस मिल गया। सावित्री के पिता को भी समय पाकर सौ संताने हुईं एवं सावित्री ने भी अपने पति सत्यवान के साथ धर्मपूर्वक जीवन-यापन करते हुए राज्य-सुख भोगा।

इस प्रकार सती सावित्री ने अपने पातिव्रत्य के प्रताप से पति को तो मृत्यु के मुख से लौटाया ही, साथ ही पति के एवं अपने पिता के कुल, दोनों की अभिवृद्धि में भी वह सहायक बनी।

जिस दिन सती सावित्री ने अपने तप के प्रभाव से यमराज के हाथ में पड़े हुए पति सत्यवान को छुड़ाया था, वही दिन ‘वट सावित्री पूर्णिमा’ के रूप में आज भी मनाया जाता है। इस दिन सौभाग्यशाली स्त्रियाँ अपने सुहाग की रक्षा के लिए वट वृक्ष की पूजा करती हैं एवं व्रत-उपवास आदि रखती हैं।

कैसी रहीं हैं भारत की आदर्श नारियाँ ! अपने पति को मृत्यु के मुख से लौटाने में यमराज से भी धर्मचर्चा करने का सामर्थ्य रहा है भारत की देवियों में। सावित्री की दिव्य गाथा यही संदेश देती है कि हे भारत की देवियों ! तुममें अथाह सामर्थ्य है, अथाह शक्ति है। संतों-महापुरुषों के सत्संग में जाकर तुम अपनी छुपी हुई शक्ति को जाग्रत करके अवश्य महान बन सकती हो एवं सावित्री-मीरा-मदालसा की याद को पुनः ताजा कर सकती हो।

 

Advertisements

गृहस्थ जीवन की शोभा

59663_492560220798941_1709188274_n

“संयोजक ने भूल से एक सच्ची बात कह दी। सचमुच, कस्तूरबा हमारी ‘माँ’ के समान ही हैं। मैं इनको आदर देता हूँ।”

महात्मा गाँधी और उनकी पत्नी कस्तूरा का दाम्पत्य-प्रेम विषय-वासना से प्रेरित न होकर एक आदर्श, विशुद्ध, निष्कपट प्रेम का जाज्वल्यमान उदाहरण था। वैसे प्रारम्भ में गाँधी जी भी कामविकार के मोह से अत्यंत प्रभावित थे। उन्होंने अपनी जीवनी में यह बात बड़ी सच्चाई से लिखी है कि अपने पिता की मृत्यु के समय भी वे अपनी पत्नी के साथ बिस्तर पर थे।

ऐसी स्थिति थी लेकिन उन्होंने अपने जीवन में कुछ आदर्श नियमों को स्थान दिया हुआ था। जैसे – नित्य सुबह शाम प्रार्थना करना, राम नाम का जप करना, श्रीमद् भगवद् गीता का अध्ययन  करना, हर सोमवार को मौन रखना आदि। जिससे उनका काम राम में बदला और निष्कामता का उनके जीवन में प्राकट्य हुआ। निष्कामता से क्षमताएँ विकसित होती है।

गांधी जी एवं उनकी पत्नी कस्तूरबा एक दूसरे को केवल शरीर-भोग की वस्तु नहीं मानते थे, बल्कि आत्मिक प्रेम के साथ एक-दूसरे का पूरा सम्भव करते थे।

एक बार महात्मा गाँधी एक सभा में शामिल होने के अपनी धर्मपत्नी कस्तूरबा के साथ श्री लंका गये। गाँधी जी कस्तूरबा को ‘बा’ कहकर बुलाते थे। गुजराती में ‘माँ’ को ‘बा’ बोलते हैं।

गाँधी जी द्वारा कस्तूरबा जी को ‘बा’ कहकर बुलाने के कारण सभा के संयोजक ने समझा कि महात्मा गाँधी के साथ इनकी माँ भी आयी हैं, इसलिए गाँधी जी का परिचय देते समय संयोजक ने सभा में कहाः “भाइयो एवं बहनों ! आप और हम भाग्य शाली हैं कि इस सभा में गाँधी जी तो आये ही हैं पर साथ में उनकी माँ भी आयी है।”

गाँधी जी के साथ जो अन्य लोग थे, वे शर्माये कि ‘अरर… हम लोगों ने इन्हें पहले नहीं बताया और इन्होंने यह क्या कह दिया !’ कस्तूरबा भी बड़ी शर्मायी पर गाँधी जी खूब हँसे। जब गाँधी जी बोलने के लिए खड़े हुए तो उन्होंने कहाः “संयोजक ने भूल से एक सच्ची बात कह दी। सचमुच, कस्तूरबा हमारी ‘माँ’ के समान ही हैं। मैं इनको आदर देता हूँ।”

‘मेरी पत्नी मेरे लिए क्या सोचेगी?’ ऐसा न सोचकर उनके हित की भावना को प्रधानता देने वाले गाँधी जी और ‘मेरे पति मेरे हित की भावना से ही ऐसा कह रहे हैं।’ इस प्रकार का विवेक तथा अपने पति के प्रति विशुद्ध, उत्कट प्रेम रखने वाली त्याग की प्रतिमूर्ति कस्तूरबा का दाम्पत्य जीवन सभी गृहस्थों के लिए एक उत्तम आदर्श प्रस्तुत करता है। पैसा और प्रसिद्धि के पीछे समाज को पथभ्रष्ट करने का जघन्य अपराध कर रहे फिल्मी अभिनेताओं व अभिनेत्रियों की नकल करके अपना दाम्पत्य जीवन तबाह करने की मूर्खता करने की बजाय हमारे भारतवासी उतना ही समय संत-महात्माओं की जीवनियाँ पढ़ने में लगायें तो कितना अच्छा होगा।