मेरे घर की लक्ष्मी….

 

maa bharati shri ji

मेरे घर की लक्ष्मी….

एक धनाढय सेठ था, पर था बड़ा कंजूस स्वभाव का। दान-पुण्य के लिए तो उसका हाथ कभी खुलता ही न था। उसके घर जो पुत्रवधू आयी वह बड़े कुलीन और सत्संगी घराने की थी। घर के संस्कारी माहौल और सत्संग में जाने के कारण बचपन से ही उसके स्वभाव में बड़े-बुजर्गों की सेवा, साधु-संतों का स्वागत-सत्कार, सत्संग सुनना, दान-दक्षिणा देना आदि उच्च संस्कार आत्मसात् हो गये थे। वह व्यर्थ खर्च के तो खिलाफ थी परंतु अच्छे कार्यों में, लोक-मांगल्य के कार्यों में पैसे खर्चने में हिचक नहीं रखनी चाहिए, ऐसी उसकी ऊँची मति थी। ससुरजी की कंजूसी भरी रीति-नीति उसे पसंद न आयी। वह प्रयत्नशील रहती कि ससुर जी का लोभी-लालची मन उदार व परोपकारी बने।

एक दिन सेठजी घर पर ही थे। बहू पड़ोसन से बातें कर रही थी। पड़ोसन ने पूछाः “क्यों बहना ! आज खाने में क्या-क्या बनाया था ?”

तब बहू ने कहाः “बहन ! आज कहाँ रसोई बनायी, हमने तो खाया बासी और बन गये उपवासी।”

बहू के ये शब्द ससुरजी के कानों में पड़े तो वे चौंके और अपनी पत्नी पर बिगड़ पड़े कि “ठीक है, मैं कंजूस हूँ, परंतु इसका मतलब यह नहीं है कि मेरी समाज में कोई इज्जत ही नहीं है। तुमने बहू को बासी अन्न खिला दिया। अब वह तो सारे मुहल्ले में मेरी कंजूसी का ढिंढोरा पीट रही है।”

सेठानी ने कहाः “मैंने कभी बहू को बासी खाना दिया ही नहीं है। मैं इतनी मूर्ख नहीं हूँ कि इतना भी न जानूँ।” सेठ ने बहू को बुलाकर पूछाः “बेटी ! तुमने तो आज ताजा भोजन किया है। फिर पड़ोसन से झूठ क्यों कहा कि खाया बासी और बन गये उपवासी ?”

“ससुर जी ! मैंने झूठ नहीं कहा बल्कि सौ प्रतिशत सत्य कहा है।”

बुद्धिमान बहू ने नम्रतापूर्ण स्वर में मैं सत्य समझाते हुए कहाः “जरा सोचिये, ससुर जी ! आज हमारे पर धन-दौलत है, जिससे हम खूब सुख-सुविधाओं में आनंद से रह रहे हैं। यह वास्तव में हमारे पूर्वजन्म के पुण्य कर्मों का ही फल है। इसलिए आज हम जो सुख भोग रहे हैं, वह सब बासी आहार के समान है अर्थात् हम बासी खा रहे हैं और जो धन हमें मिला है उससे दान, पुण्य, धर्म या परोपकार के कार्य तो कर नहीं रहे हैं। अतः अगले जन्म के लिए तो हमने कुछ पुण्य-पूँजी सँजोयी नहीं है। इसलिए अगले जन्म में हमें उपवास करना पड़ेगा। अब आप ही बताइये, क्या मेरा वचन सत्य नहीं है ?”

बहू की युक्तिपूर्ण सुंदर सीख सुनकर सेठ की बुद्धि पर से लोभ का पर्दा हट गया, सदज्ञान का प्रकाश हुआ और वे गदगद स्वर से बोलेः “मैं धन्य हुआ जो तुझ जैसी सत्संगी की सुपुत्री मेरे घर की लक्ष्मी बनी। बेटी ! तूने आज मुझे जीवन जीने की सही राह दिखायी है।”

फिर तो सेठ जी ने दान-पुण्य की ऐसी सरिता प्रवाहित की कि दान का औदार्य-सुख, आत्मसंतोष, उज्जवल भविष्य और परोपकारिता का मंगलमय सुस्वभाव उन्हें प्राप्त हो गया, जिसके आगे धन-संग्रह एवं सुख-सुविधा का बाह्य सुख उन्हें तुच्छ लगने लगा। परोपकार से प्राप्त होने वाली आंतरिक प्रसन्नता और प्रभुप्राप्ति ही सार है यह उनकी समझ में आ गया।

 

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रानी कलावती

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रानी कलावती

‘स्कन्द पुराण’ के ब्रह्मोत्तर खंड में कथा आती है कि ‘काशीनरेश की कन्या कलावती के साथ मथुरा के दाशार्ह नामक राजा का विवाह हुआ। विवाह के बाद राजा ने रानी को अपने पलंग पर बुलाया लेकिन उसने इन्कार कर दिया। तब राजा ने बल प्रयोग की धमकी दी। रानी ने कहाः “स्त्री के साथ संसार-व्यवहार करना हो तो बलप्रयोग नहीं, स्नेह प्रयोग करना चाहिए। नाथ ! मैं भले आपकी रानी हूँ, लेकिन आप मेरे साथ बलप्रयोग करके संसार-व्यवहार न करें।”

लेकिन वह राजा था। रानी की बात सुनी-अनसुनी करके नजदीक गया। ज्यों ही उसने रानी का स्पर्श किया, त्यों ही उसे विद्युत जैसा करंट लगा। उसका स्पर्श करते ही राजा का अंग-अंग जलने लगा। वह दूर हटा और बोलाः “क्या बात है? तुम इतनी सुन्दर और कोमल हो फिर भी तुम्हारे शरीर के स्पर्श से मुझे जलन होने लगी?”

रानीः “नाथ ! मैंने बाल्यकाल में दुर्वासा ऋषि से शिवमंत्र लिया था। उसे जपने से मेरी सात्त्विक ऊर्जा का विकास हुआ है, इसीलिए मैं आपके नजदीक नहीं आती थी। जैसे अंधेरी रात और दोपहर एक साथ नहीं रहते, वैसे ही आपने शराब पीनेवाली वेश्याओं के साथ और कुलटाओं के साथ जो संसार-भोग भोगे हैं उससे आपके पाप के कण आपके शरीर, मन तथा बुद्धि में अधिक हैं और मैंने जप किया है उसके कारण मेरे शरीर में ओज, तेज व आध्यात्मिक कण अधिक हैं। इसीलिए मैं आपसे थोड़ी दूर रहकर प्रार्थना करती थी। आप बुद्धिमान हैं, बलवान हैं, यशस्वी हैं और धर्म की बात भी आपने सुन रखी है, लेकिन आपने शराब पीनेवाली वेश्याओं और कुलटाओं के साथ भोग भी भोगे हैं।”

राजाः “तुम्हें इस बात का पता कैसे चल गया?”

रानीः “नाथ ! हृदय शुद्ध होता है तो यह ख्याल आ जाता है।”

राजा प्रभावित हुआ और रानी से बोलाः “तुम मुझे भी भगवान शिव का वह मंत्र दे दो।”

रानीः “आप मेरे पति हैं, मैं आपकी गुरु नहीं बन सकती। आप और हम गर्गाचार्य महाराज के पास चलें।”

दोनों गर्गाचार्य के पास गये एवं उनसे प्रार्थना की। गर्गाचार्य ने उन्हें स्नान आदि से पवित्र होने के लिए कहा और यमुना तट पर अपने शिवस्वरूप के ध्यान में बैठकर उन्हें निगाह से पावन किया, फिर शिवमंत्र देकर शांभवी दीक्षा से राजा के ऊपर शक्तिपात किया।

कथा कहती है कि देखते ही देखते राजा के शरीर से कोटि-कोटि कौए निकल-निकल कर पलायन करने लगे। काले कौए अर्थात् तुच्छ परमाणु। काले कर्मों के तुच्छ परमाणु करोड़ों की संख्या में सूक्ष्मदृष्टि के द्रष्टाओं द्वारा देखे गये। सच्चे संतों के चरणों में बैठकर दीक्षा लेने वाले सभी साधकों को इस प्रकार के लाभ होते ही हैं। मन, बुद्धि में पड़े हुए तुच्छ कुसंस्कार भी मिटते हैं। आत्म-परमात्मप्राप्ति की योग्यता भी निखरती है। व्यक्तिगत जीवन में सुख शांति, सामाजिक जीवन में सम्मान मिलता है तथा मन-बुद्धि में सुहावने संस्कार भी पड़ते हैं और भी अनगिनत लाभ होते हैं जो निगुरे, मनमुख लोगों की कल्पना में भी नहीं आ सकते। मंत्रदीक्षा के प्रभाव से हमारे पाँचों शरीरों के कुसंस्कार व काले कर्मों के परमाणु क्षीण होते जाते हैं। थोड़ी ही देर में राजा निर्भार हो गया एवं भीतर के सुख से भर गया।

शुभ-अशुभ, हानिकारक एवं सहायक जीवाणु हमारे शरीर में रहते हैं। जैसे पानी का गिलास होंठ पर रखकर वापस लायें तो उस पर लाखों जीवाणु पाये जाते हैं यह वैज्ञानिक अभी बोलते हैं। लेकिन शास्त्रों ने तो लाखों वर्ष पहले ही कह दियाः

सुमति-कुमति सबके उर रहहिं।

जब आपके अंदर अच्छे विचार रहते हैं तब आप अच्छे काम करते हैं और जब भी हलके विचार आ जाते हैं तो आप न चाहते हुए भी गलत कर बैठते हैं। गलत करने वाला कई बार अच्छा भी करता है तो मानना पड़ेगा कि मनुष्य-शरीर पुण्य और पाप का मिश्रण है। आपका अंतःकरण शुभ और अशुभ का मिश्रण है। जब आप लापरवाह होते हैं तो अशुभ बढ़ जाते हैं अतः पुरुषार्थ यह करना है कि अशुभ क्षीण होता जाय और शुभ पराकाष्ठा तक परमात्म-प्राप्ति तक पहुँच जाय।