वास्तविक सौन्दर्य

 

divya vibhuti maa bharati shri ji

वास्तविक सौन्दर्य

सौन्दर्य सबके जीवन की माँग है। वास्तविक सौन्दर्य उसे नहीं कहते जो आकर चला जाये। जो कभी क्षीण हो जाये, नष्ट हो जाये वह सौन्दर्य नहीं है। संसारी लोग जिसे सौन्दर्य बोलते हैं वह हाड़-मांस का सौन्दर्य तब तक अच्छा लगता है जब तक मन में विकार होता है अथवा तो तब तक अच्छा लगता है जब तक बाहरी रूप-रंग अच्छा होता है। फिर तो लोग उससे भी मुँह मोड़ लेते हैं। किसी व्यक्ति या वस्तु का सौन्दर्य हमेशा टिक नहीं सकता और परम सौन्दर्यस्वरूप परमात्मा का सौन्दर्य कभी मिट नहीं सकता।

एक राजकुमारी थी। वह सुन्दर, संयमी एवं सदाचारी थी तथा सदग्रन्थों का पठन भी करती थी। उस राजकुमारी की निजी सेवा में एक विधवा दासी रखी गयी थी। उस दासी के साथ राजकुमारी दासी जैसा नहीं बल्कि वृद्धा माँ जैसा व्यवहार करती थी।

एक दिन किसी कारणवशात् उस दासी का 20-22 साल का युवान पुत्र राजमहल में अपनी माँ के पास आया। वहाँ उसने राजकुमारी को भी देखा। राजकुमारी भी करीब 18-21 साल की थी। सुन्दरता तो मानों, उसमें कूट-कूट कर भरी थी। राजकुमारी का ऐसा सौन्दर्य देखकर दासीपुत्र अत्यंत मोहित हो गया। वह कामपीड़ित होकर वापस लौटा।

जब दासी अपने घर गयी तो देखा कि अपना पुत्र मुँह लटकाये बैठा है। दासी के बहुत पूछने पर लड़का बोलाः “मेरी शादी तुम उस राजकुमारी के साथ करवा दो।”

दासीः “तेरी मति तो नहीं मारी गयी?  कहाँ तू विधवा दासी का पुत्र और कहाँ वह राजकुमारी? राजा को पता चलेगा तो तुझे फाँसी पर लटका देंगे।”

लड़काः “वह सब मैं नहीं जानता। जब तक मेरी शादी राजकुमारी के साथ नहीं होगी, तब तक मैं अन्न का एक दाना भी खाऊँगा।”

उसने कमस खाली। एक दिन… दो दिन… तीन दिन…. ऐसा करते-करते पाँच दिन बीत गये। उसने न कुछ खाया, न कुछ पिया। दासी समझाते-समझाते थक गयी। बेचारी का एक ही सहारा था। पति तो जवानी में ही चल बसा था और एक-एक करके दो पुत्र भी मर गये थे। बस, यह ही लड़का था, वह भी ऐसी हठ लेकर बैठ गया।

समझदार राजकुमारी ने भाँप लिया कि दासी उदास-उदास रहती है। जरूर उसे कोई परेशानी सता रही है। राजकुमारी ने दासी से पूछाः “सच बताओ, क्या बात है? आजकल तुम बड़ी खोयी-खोयी-सी रहती हो?”

दासीः “राजकुमारीजी ! यदि मैं आपको मेरी व्यथा बता दूँ तो आप मुझे और मेरे बेटे को राज्य से बाहर निकलवा देंगी।”

ऐसा कहकर दासी फूट-फूटकर रोने लगी।

राजकुमारीः “मैं तुम्हें वचन देती हूँ। तुम्हें और तुम्हारे बेटे को कोई सजा नहीं दूँगी। अब तो बताओ !”

दासीः “आपको देखकर मेरा लड़का अनधिकारी माँग करता है कि शादी करूँगा तो इस सुन्दरी  से ही करूँगा और जब तक शादी नहीं होती तब तक भोजन नहीं करूँगा। आज पाँच दिन से उसने खाना-पीना छोड़ रखा है। मैं तो समझा-समझाकर थक गयी।”

राजकुमारीः “चिन्ता मत करो। तुम कल उसको मेरे पास भेज देना। मैं उसकी वास्तविक शादी करवा दूँगी।”

लड़का खुश होकर पहुँच गया राजकुमारी से मिलने। राजकुमारी ने उससे कहाः “मुझसे शादी करना चाहता है?”

“जी हाँ।”

“आखिर किस वजह से?”

“तुम्हारे मोहक सौन्दर्य को देखकर मैं घायल हो गया हूँ।”

“अच्छा ! तो तू मेरे सौन्दर्य की वजह से मुझसे शादी करना चाहता है? यदि मैं तुझे 80-90 प्रतिशत सौन्दर्य दे दूँ तो तुझे तृप्ति होगी? 10 प्रतिशत सौन्दर्य मेरे पास रह जायेगा तो तुझे तृप्ति होगी? 10 प्रतिशत सौन्दर्य मेरे पास रह जायेगा तो तुझे चलेगा न?”

“हाँ, चलेगा।”

“ठीक है…. तो कल दोपहर को आ जाना।”

राजकुमारी ने रात को जमालगोटे का जुलाब ले लिया जिससे रात्रि को दो बजे जुलाब के कारण हाजत तीव्र हो गयी। पूरे पेट की सफाई करके सारा कचरा बाहर। राजकुमारी ने सुन्दर नक्काशीदार कुण्डे में अपने पेट का वह कचरा डाल दिया। कुछ समय बाद उसे फिर से हाजत हुई तो इस बार जरीकाम और मलमल से सुसज्जित कुंडे में राजकुमारी ने कचरा उतार दिया। दोनों कुंडों को चारपाई के एक-एक पाये के पास रख दिया। उसके बाद फिर से एक बार जमालघोटे का जुलाब ले लिया। तीसरा दस्त तीसरे कुण्डे में किया। बाकी का थोड़ा-बहुत जो बचा हुआ मल था, विष्ठा थी उसे चौथी बार में चौथे कुंडे में निकाल दिया। इन दो कुंडों को भी चारपाई के दो पायों के पास में रख दिया।

एक ही रात  जमालगोटे के कारण राजकुमारी का चेहरा उतर गया, शरीर खोखला सा हो गया। राजकुमारी की आँखें उतर गयीं, गालों की लाली उड़ गयी, शरीर एकदम कमजोर पड़ गया।

दूसरे दिन दोपहर को वह लड़का खुश होता हुआ राजमहल में आया और अपनी माँ से पूछने लगाः “कहाँ है राजकुमारी जी?”

दासीः “वह सोयी है चारपाई पर।”

राजकुमारी के नजदीक जाने से उसका उतरा हुआ मुँह देखकर दासीपुत्र को आशंका हुई। ठीक से देखा तो चौंक पड़ा और बोलाः

“अरे ! तुम्हें या क्या हो गया? तुम्हारा चेहरा इतना फीका क्यों पड़ गया है? तुम्हारा सौन्दर्य कहाँ चला गया?”

राजकुमारी ने बहुत धीमी आवाज में कहाः “मैंने तुझे कहा था न कि मैं तुझे अपना 90 प्रतिशत सौन्दर्य दूँगी, अतः मैंने सौन्दर्य निकालकर रखा है।”

“कहाँ है?” आखिर तो दासीपुत्र था, बुद्धि मोटी थी।

“इस चारपाई के पास चार कुंडे हैं। पहले कुंडे में 50 प्रतिशत, दूसरे में 25 प्रतिशत सौन्दर्य दूँगी, अतः मैंने सौन्दर्य निकालकर रखा है।”

“कहाँ है?” आखिर तो दासीपुत्र था, बुद्धि मोटी थी।

“इस चारपाई के पास चार कुंडे हैं। पहले कुंडे में 50 प्रतिशत, दूसरे में 25 प्रतिशत तीसरे कुंडे में 10 प्रतिशत और चौथे में 5-6 प्रतिशत सौन्दर्य आ चुका है।”

“मेरा सौन्दर्य है। रात्रि के दो बजे से सँभालकर कर रखा है।”

दासीपुत्र हैरान हो गया। वह कुछ समझ नहीं पा रहा था। राजकुमारी ने दासी पुत्र का विवेक जागृत हो इस प्रकार उसे समझाते हुए कहाः “जैसे सुशोभित कुंडे में विष्ठा है ऐसे ही चमड़े से ढँके हुए इस शरीर में यही सब कचरा भरा हुआ है। हाड़-मांस के जिस शरीर में तुम्हें सौन्दर्य नज़र आ रहा था, उसे एक जमालगोटा ही नष्ट कर डालता है। मल-मूत्र से भरे इस शरीर का जो सौन्दर्य है, वह वास्तविक सौन्दर्य नहीं है लेकिन इस मल-मूत्रादि को भी सौन्दर्य का रूप देने वाला वह परमात्मा ही वास्तव में सबसे सुन्दर है भैया ! तू उस सौन्दर्यवान परमात्मा को पाने के लिए आगे बढ़। इस शरीर में क्या रखा है?”

दासीपुत्र की आँखें खुल गयीं। राजकुमारी को गुरु मानकर और माँ को प्रणाम करके वह सच्चे सौन्दर्य की खोज में निकल पड़ा। आत्म-अमृत को पीने वाले संतों के द्वार पर रहा और परम सौन्दर्य को प्राप्त करके जीवनमुक्त हो गया।

कुछ समय बाद वही भूतपूर्व दासी पुत्र घूमता-घामता अपने नगर की ओर आया और सरिता किनारे एक झोंपड़ी बनाकर रहने लगा। खराब बातें फैलाना बहुत आसान है किंतु अच्छी बातें, सत्संग की बातें बहुत परिश्रम और सत्य माँग लेती है। नगर में कोई हीरो या हीरोइन आती है तो हवा की लहर के साथ समाचार पूरे नगर में फैल जाता है लेकिन एक साधु, एक संत अपने नगर में आये हुए हैं, ऐसे समाचार किसी को जल्दी नहीं मिलते।

दासीपुत्र में से महापुरुष बने हुए उन संत के बारे में भी शुरुआत में किसी को पता नहीं चला परंतु बाद में धीरे-धीरे बात फैलने लगी। बात फैलते-फैलते राजदरबार तक पहुँची कि ‘नगर में कोई बड़े महात्मा पधारे हुए हैं। उनकी निगाहों में दिव्य आकर्षण है, उनके दर्शन से लोगों को शांति मिलती है।’

राजा ने यह बात राजकुमारी से कही। राजा तो अपने राजकाज में ही व्यस्त रहा लेकिन राजकुमारी आध्यात्मिक थी। दासी को साथ में लेकर वह महात्मा के दर्शन करने गयी।

पुष्प-चंदन आदि लेकर राजकुमारी वहाँ पहुँची। दासीपुत्र को घर छोड़े 4-5 वर्ष बीत गये थे, वेश बदल गया था, समझ बदल चुकी थी, इस कारण लोग तो उन महात्मा को नहीं जान पाये लेकिन राजकुमारी भी नहीं पहचान पायी। जैसे ही राजकुमारी महात्मा को प्रणाम करने गयी कि अचानक वे महात्मा राजकुमारी को पहचान गये। जल्दी से नीचे आकर उन्होंने स्वयं राजकुमारी के चरणों में गिरकर दंडवत् प्रणाम किया।

राजकुमारीः “अरे, अरे…. यह आप क्या रहे हैं महाराज !”

“देवी ! आप ही मेरी प्रथम गुरु हैं। मैं तो आपके हाड़-मांस के सौन्दर्य के पीछे पड़ा था लेकिन इस हाड़-मांस को भी सौन्दर्य प्रदान करने वाले परम सौन्दर्यवान परमात्मा को पाने की प्रेरणा आप ही ने तो मुझे दी थी। इसलिए आप मेरी प्रथम गुरु हैं। जिन्होंने मुझे योगादि सिखाया वे गुरु बाद के। मैं आपका खूब-खूब आभारी हूँ।”

यह सुनकर वह दासी बोल उठीः “मेरा बेटा !”

तब राजकुमारी ने कहाः “अब यह तुम्हारा बेटा नहीं, परमात्मा का बेटा हो गया है…. परमात्म-स्वरूप हो गया है।”

धन्य हैं वे लोग जो बाह्य रूप से सुन्दर दिखने वाले इस शरीर की वास्तविक स्थिति और नश्वरता का ख्याल करके परम सुन्दर परमात्मा के मार्ग पर चल पड़ते हैं…..

 

गृहस्थ जीवन की शोभा

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“संयोजक ने भूल से एक सच्ची बात कह दी। सचमुच, कस्तूरबा हमारी ‘माँ’ के समान ही हैं। मैं इनको आदर देता हूँ।”

महात्मा गाँधी और उनकी पत्नी कस्तूरा का दाम्पत्य-प्रेम विषय-वासना से प्रेरित न होकर एक आदर्श, विशुद्ध, निष्कपट प्रेम का जाज्वल्यमान उदाहरण था। वैसे प्रारम्भ में गाँधी जी भी कामविकार के मोह से अत्यंत प्रभावित थे। उन्होंने अपनी जीवनी में यह बात बड़ी सच्चाई से लिखी है कि अपने पिता की मृत्यु के समय भी वे अपनी पत्नी के साथ बिस्तर पर थे।

ऐसी स्थिति थी लेकिन उन्होंने अपने जीवन में कुछ आदर्श नियमों को स्थान दिया हुआ था। जैसे – नित्य सुबह शाम प्रार्थना करना, राम नाम का जप करना, श्रीमद् भगवद् गीता का अध्ययन  करना, हर सोमवार को मौन रखना आदि। जिससे उनका काम राम में बदला और निष्कामता का उनके जीवन में प्राकट्य हुआ। निष्कामता से क्षमताएँ विकसित होती है।

गांधी जी एवं उनकी पत्नी कस्तूरबा एक दूसरे को केवल शरीर-भोग की वस्तु नहीं मानते थे, बल्कि आत्मिक प्रेम के साथ एक-दूसरे का पूरा सम्भव करते थे।

एक बार महात्मा गाँधी एक सभा में शामिल होने के अपनी धर्मपत्नी कस्तूरबा के साथ श्री लंका गये। गाँधी जी कस्तूरबा को ‘बा’ कहकर बुलाते थे। गुजराती में ‘माँ’ को ‘बा’ बोलते हैं।

गाँधी जी द्वारा कस्तूरबा जी को ‘बा’ कहकर बुलाने के कारण सभा के संयोजक ने समझा कि महात्मा गाँधी के साथ इनकी माँ भी आयी हैं, इसलिए गाँधी जी का परिचय देते समय संयोजक ने सभा में कहाः “भाइयो एवं बहनों ! आप और हम भाग्य शाली हैं कि इस सभा में गाँधी जी तो आये ही हैं पर साथ में उनकी माँ भी आयी है।”

गाँधी जी के साथ जो अन्य लोग थे, वे शर्माये कि ‘अरर… हम लोगों ने इन्हें पहले नहीं बताया और इन्होंने यह क्या कह दिया !’ कस्तूरबा भी बड़ी शर्मायी पर गाँधी जी खूब हँसे। जब गाँधी जी बोलने के लिए खड़े हुए तो उन्होंने कहाः “संयोजक ने भूल से एक सच्ची बात कह दी। सचमुच, कस्तूरबा हमारी ‘माँ’ के समान ही हैं। मैं इनको आदर देता हूँ।”

‘मेरी पत्नी मेरे लिए क्या सोचेगी?’ ऐसा न सोचकर उनके हित की भावना को प्रधानता देने वाले गाँधी जी और ‘मेरे पति मेरे हित की भावना से ही ऐसा कह रहे हैं।’ इस प्रकार का विवेक तथा अपने पति के प्रति विशुद्ध, उत्कट प्रेम रखने वाली त्याग की प्रतिमूर्ति कस्तूरबा का दाम्पत्य जीवन सभी गृहस्थों के लिए एक उत्तम आदर्श प्रस्तुत करता है। पैसा और प्रसिद्धि के पीछे समाज को पथभ्रष्ट करने का जघन्य अपराध कर रहे फिल्मी अभिनेताओं व अभिनेत्रियों की नकल करके अपना दाम्पत्य जीवन तबाह करने की मूर्खता करने की बजाय हमारे भारतवासी उतना ही समय संत-महात्माओं की जीवनियाँ पढ़ने में लगायें तो कितना अच्छा होगा।

 

राम के दीवाने…

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जिनके पास ज्ञान की शलाका आ गई है, उनको रोम-रोम में रमनेवाले रामतत्त्व का अनुभव हो जाता है। वे राम के दीवाने हो जाते हैं। राम के दीवाने कैसे होते हैं?
राम के दीवानों को जग के सुख की चाह नहीं।
मुसीबतों के पहाड़ टूटे मुँह से निकलती आह नहीं।।
स्वामी रामतीर्थ बोलते थेः “हे भगवान ! आज मुसीबत भेजना भूल गये क्या? हम रोज ताजी मुसीबत चाहते हैं। आज कोई मुसीबत नहीं आयी?कोई प्रोब्लेम नहीं आया?”
रामतीर्थ के लिए कई कुप्रचार फैलाये जाते थे, कई अफवाहें चलती थीं। राम बादशाह तो ॐ….ॐ….ॐ….. आनन्द…. मैं ब्रह्म हूँ….’ इस प्रकार आत्मानंद में, ब्रह्मानंद में मस्त रहते, हँसते रहते, नाचते रहते। तथा कथित सयाने लोग उनकी आलोचना करते की ऐसा कोई संत होता है ? उन्माद हो गया है उन्माद। ऐसी चिट्ठियाँ भी लोग लिख देते थे।
स्वामी राम कहतेः
“मुझे सीख देने वाले ! मुझे तो भले उन्माद हो गया है लेकिन तुम्हें तो उन्माद नहीं हुआ है। जाओ, तुम्हें रमणियाँ बुलाती हैं। उनके हाड़ मांस तुम्हें बुला रहे हैं। जाओ, चाटो…. चूसो। मैं तो मेरे राम की मस्ती में हूँ। मुझे तो यही उन्माद काफी है। तुम भले रमणियों के उन्माद में खुशी मनाओ। लेकिन सावधान ! वह उन्माद बाबरा भूत है ! दिखता है अच्छा, सुन्दर, सुहाना लेकिन ज्यों ही आलिंगन किया तुरन्त सत्यानाश होगा। राम रस के उन्माद का अनुभव एक बार करके देखो, फिर जन्मों के उन्माद दूर हो जायेंगे।”
किसी ने रामतीर्थ को खत लिखा कि, “आपके निकटवर्ती शिष्य एन. एस. नारायण ने संन्यासी के वस्त्र उतार कर पेन्ट कोट पहन लिया, संन्यासी में से गृहस्थी हो गया ज्ञानी का शिष्य, साधु बना और फिर गुलाम बन गया, नौकरी करता है ! उसको जरा सुधारो।”
रामतीर्थ ने जवाब दियाः “राम बादशाह आप में ही समाता नहीं है। राम बादशाह कोई गङरिया नहीं है कि भेड़-बकरियों को सँभालता रहे। वह अपनी इच्छा से मेरे पास आया, अपनी मरजी से साधु बना, उसकी मरजी। सब सबकी सँभाले, राम बादशाह अपने आप में मस्त हैं।”
ज्ञानी को सब समेट लेने में कितनी देर लगती है? शिष्यों को सुधारने के लिए पाँच-दस बार परिश्रम कर लिया, अगर वे नहीं सुधरते तो जायें। ज्ञानी उपराम ही जाते हैं तो घाटा उन्हीं मूर्खों को पड़ेगा। ज्ञानी को क्या है? वैसे मूर्खों को हम आज नहीं जानते लेकिन स्वामी रामतीर्थ को लाखों लोग जानते हैं, करोड़ों लोग जानते हैं।
आप भी कृपा करके राम की मस्ती की ओर उन्मुख बनें। उन सौभाग्यशाली साधकों के अनुभव की ओर चलिए किः
राम के दीवानों को जग के सुख की चाह नहीं ।
मुसीबतों के पहाड़ टूटे मुँह से निकलती आह नहीं ।।